पहले जागो फिर जगाओ

हमें यह कहने में गर्व का अनुभव होता है कि हम भारत वर्ष के निवासी हैं जो उस समय विश्व गुरु था जब दूसरे देश सभ्यता और संस्कृति से परिचित तक नहीं थे। विश्व पटल पर मानव जनित आज जितनी भी समस्याएँ हैं, हमारा देश सदियों पहले से उसके प्रति सबको आगाह करता रहा है। इसके साथ ही इस कटु यथार्थ से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हम खुद सोकर दूसरों को जगाते रहे, दूसरे जाग गए और हमारी तन्द्रा अभी भी नहीं टूटी। हमारे पर्यावरण का पतन इसका जीता जागता उदाहरण है।
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में हमारे प्रबुद्ध और दूरदर्शी ऋषियों ने वृक्ष लगाने से प्राप्त होने वाले पुण्य को पुत्र प्राप्ति के समतुल्य मानकर महिमा मंडित किया है। प्रकृति की पूजा के बहाने संरक्षण की धारणा वैदिक युग से शुरु की गई थी जिसको विश्व के बहुतायत देशों ने किसी न किसी रूप में अपनाया किन्तु हम जुबानी जमा – खर्च ही करते रहे।
वैदिक युग से निकलकर मुख्यत: तीन बातें मनुष्यों को प्रभावित कीं । हमारी पहली इच्छा थी कि हम अजर – अमर बनें जिसके लिए अमृत की जरूरत होती। हमारी दूसरी इच्छा थी कि हम समृद्धशाली बनें जिसके लिए पारस पत्थर की जरुरत हुई जिसके स्पर्श मात्र से लोहा को सोना बनाया जा सकता है। तीसरी इच्छा थी हमारी कर्महीनता की स्थिति में पलक झपकते ही सब कुछ हमारे अनुकूल हो जाना जिसे चमत्कार कहते हैं और इसके लिए अलादीन का चिराग या जादुई छड़ी की जरूरत थी। अनपढ़ अशिक्षित और असभ्य विदेशी जब हमारे सम्पर्क में आए तो उनको अमृत और पारस पत्थर की तथाकथित उपयोगिता ने बहुत प्रभावित किया । जाते समय वे इन दोनों को पाने की उत्कंठा और उससे सम्बंधित ग्रंथों को साथ लेकर गए। चमत्कार उनके लिए भरोसेमंद नहीं था इसलिए इसको वे न ले जा सके और इसी को हम पकड़कर दिवा स्वप्न देखते रहे।
अजर – अमर होने की अक्षुण्ण लालसा में अमृत की तलाश जारी रही। औषधि दर औषधि की खोज करता हुआ चिकित्सा विज्ञान बताने की जरूरत नहीं कि कहाँ से कहाँ पहुँच गया और क्षण-  प्रतिक्षण आगे बढ़ता जा रहा है। अभी तक अमृत न सही किन्तु अमृत से कुछ कम अनेकानेक औषधियाँ आज हमारे लिए उपलब्ध हैं। धन के विकल्प के रूप में पारस पत्थर की तलाश करते हुए रसायन शास्त्रियों ने दर्जनों बहुमूल्य पदार्थ खोज निकाले और आज भी तलाश जारी है। अमृत और पारस पत्थर की खोज  के प्रयास ने विज्ञान को बहुत समृद्ध एवं समुन्नत किया। कई नई शाखाएँ एवं उपशाखाएँ विकसित हुईं। बहुतेरी मान्यताओं से असत्य के पर्दे हटे और कई नई मान्यताएँ प्रतिष्ठित हुईं। और हम चमत्कार को फलीभूत करने के वास्ते हाथ पर हाथ धरे अलादीन के चिराग को पाने की ख्वाहिश पालते रहे। अपने – अपने देवों को मन्नतों को पूरा करने के एवज में सुविधा शुल्क का लॉलीपॉप लेकर लुभाते रहे। दुनिया आगे बढ़ती रही और हम अतीत की गाथा गाकर आत्ममुग्ध होते रहे।
अब अपने पर्यावरण पर चर्चा कर लें। पर्यावरण का आशय हमारे परिवेश से होता है जो भौतिक और अभौतिक रूप में हमारे चारों ओर विद्यमान रहते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षिक, भौगोलिक , धार्मिक एवं प्राकृतिक आदि रूपों में असंख्य अवयव संयुक्त रूप से हमें प्रभावित करते हैं और यही इनका संयुक्त रूप में प्रभाव ही हमारा पर्यावरण कहलाता है। हमारी वैश्विक संरचना सैकड़ों भागों में विभक्त है जिसके कारण हमारा पर्यावरण भी अनेक तरह का है। धर्म, संस्कृति, शिक्षा आदि के विविध मानक और मान्यताओं में विविधता है किन्तु इनमें एक बात में पूर्णत: साम्यता और निर्विवाद सत्यता है और वह है हमारा प्राकृतिक पर्यावरण। अतएव आज का हमारा वैश्विक जनमानस इसी को लेकर चिंतित एवं जागरूक है।
वैदिक युग से अब तक तथाकथित विकास की अंधाधुंध दौड़ में सर्वाधिक क्षरण हमारी प्रकृति का ही हुआ है और अभी भी हो रहा है। प्रकृति के विभिन्न उपादानों यथा वन, नदी, पर्वत एवं भूमि को देव तुल्य मानकर हम एक तरफ पूजते रहे और दूसरी ओर विकास की आड़ में अपने स्वार्थ के आरे से  इनको काटते रहे। नदियों के विनाश से जल प्रदूषण फैल गया। वनों के विनाश ने मृदा और हवा को प्रदूषित किया। पर्वतों और खनिजों पर हो रहे हमलों ने प्राकृतिक संतुलन को बर्वाद कर दिया और कारखानों ने रासायनिक आतंक मचाया। 
विज्ञान ने बहुत कुछ दिया हम सबको लेकिन हमारी स्वार्थलिप्सा ने प्राय: दुरुपयोग का मार्ग अपनाकर निजी विकास के एवज में सामूहिक विनाश की ओर ढकेला। उदाहरण के तौर पर बीसवीं शताब्दी हमारे लिए प्लास्टिक क्रांति बनकर आई। प्लास्टिक ने विकास का अपरिमेय  सूत्रपात किया। संसद से सड़क तक, अमीर से गरीब तक, शोक से उत्सव तक, खगोल से भूगर्भ तक प्लास्टिकमय हो गया। हमारी आँख तब खुली जब जीवन में सहायक प्लास्टिक खुद जीवन बन गया और जैव जगत के लिए परमाणु बम से भी अधिक सर्वमुखी संहारक बन गया। विश्व को चिंतित होकर वर्ष 2018 को ‘बीट प्लास्टिक’ अभियान का स्वरूप देना पड़ा। 
ज्वलंत सवाल यह है कि हर अवश्यम्भावी समस्याओं के प्रति विश्व को जगाते – जगाते हम कैसे पिछड़ गए? आज सारे अभियान पश्चिमी देशों से ही शुरु होकर हमारे पास क्यों आते हैं? हम अगुआ से अनुयायी कब बन गए? हमारे पूर्वजों से पढ़ने वाले आज कैसे हमारे गुरु बन गए? हमें कहाँ होना था और हम कहाँ आ गए! अगर अभी भी हम स्वमूल्यांकन एवं मीमांसा नहीं कर सके तो फिर यह अवसर भी खो देंगे।
हम भारतीय एक जमाने से सोकर दूसरों को जगाते रहे हैं। और हमारे जगाने से दूसरे जाग भी रहे हैं किन्तु हम जहाँ के तहाँ सो रहे हैं। इस दुखद लेकिन यथार्थ पहलू का सबसे बड़ा कारण है हमारी शिक्षा पद्धति। किसी भी आने वाली समस्या का सटीक पूर्वानुमान लगा लेना इस बात को साबित करता है कि ‘ज्ञान’ के मामले में हम बहुत आगे हैं और समस्या के प्रभाव व निवारण के उपाय तक हमारी दृष्टि का पहुँच जाना इस बात को स्पष्ट करता है कि भावना के धरातल पर हम प्रथम श्रेणी के विचारक हैं। किन्तु समझ एवं सोच को अमली जामा न पहना पाना, सिर्फ दूसरों को सचेत करते रहना और अत्यधिक आत्ममुग्धता हमें कोरे उपदेशक एवं अकर्मण्य की जमात में लाकर खड़ा कर देते हैं। यह अनायास ही साबित हो जाता है कि हम पूर्ण शिक्षित नहीं हैं। शिक्षा के तीनों सोपान यथा ज्ञान, भाव और कर्म को हम पार नहीं कर पाए हैं। हमारी शिक्षा हमारे कर्म को उचित दिशा में परिवर्तित करने में सफल नहीं है। 
असंतुलित पर्यावरण आए दिन चेतावनी दे रहा है। जरूरत है कि इस चेतावनी को हम समझें और मन, वाणी एवं कर्म से पूर्ण मनोयोग के साथ जुड़ जाएँ। विषैले पर्यावरण को देखते हुए इसे अंतिम अवसर के रूप में लें और अपने – अपने स्तर पर सुधार हेतु लग जाएँ। फिर से कोई सोते रहने का आरोप न लगा सके। वैदिक ऋचाओं की सार्थकता को अमली जामा पहनाते हुए वृक्षारोपण, साफ- सफाई, प्लास्टिक से परहेज़, यथासम्भव गाड़ियों का कम से कम उपयोग, रसायनों का अत्यल्प उपयोग तथा प्राकृतिक संसाधनों का मानव हित में समुचित उपयोग करें। पूरी नैतिकता व ईमानदारी से पर्यावरण संरक्षण के यज्ञ में शामिल होकर प्रबुद्ध देव संतति होने का परिचय देते हुए विश्व गुरु की गरिमा को प्राप्त करने की दिशा में पहल करें। तभी हम सही मायने में एक जागरूक भारतीय होने का फर्ज अदा कर सकेंगे।

डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ मेघालय

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