बीजिंग को झटका: 28 लाख की आबादी वाले लिथुआनिया ने चीन की अगुवाई वाला यूरोपीय ब्लॉक छोड़ा; ड्रैगन ने कहा- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता

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बीजिंग11 मिनट पहले

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2019 में CEEC मीटिंग के दौरान सदस्य देशों के प्रतिनिधी। अब लिथुआनिया इस ग्रुप से अलग हो गया है। (फाइल) - Dainik Bhaskar

2019 में CEEC मीटिंग के दौरान सदस्य देशों के प्रतिनिधी। अब लिथुआनिया इस ग्रुप से अलग हो गया है। (फाइल)

लिथुआनिया ने चीन की अगुवाई वाले ईस्टर्न यूरोपीय ब्लॉक 17+1 को छोड़ दिया है। इस ब्लॉक CEEC कहा जाता है। मंगलवार को यह फैसला लेते हुए लिथुआनिया के विदेश मंत्री ग्रेबिलियस लैंड्सवर्गीज ने कहा- हमें नहीं लगता कि 17+1 जैसा ग्रुप अब बचा है। लिहाजा, हमने इसे छोड़ने का फैसला किया है। दूसरी तरफ, चीन ने लिथुआनिया के इस कदम को ज्यादा तवज्जो ने देते हुए कहा- इस तरह इक्का-दुक्का चीजें तो हमेशा होती रहती हैं।

क्या है CEEC
पूर्वी यूरोप में चीन अपना ट्रेड बढ़ाने के लिए कई कदम उठा चुका है। 2012 में उसने ‘को-ऑपरेशन बिटवीन चाइना एंड सेंट्रल एंड ईस्टर्न यूरोप कंट्रीज’ बनाया था। इसे ही CEEC या फिर 17+1 ब्लॉक कहा जाता है। इस ग्रुप के बाकी सदस्य देश हैं- अल्बानिया, बोस्निया एवं हर्जेगोविना, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, लात्विया, स्लोवाकिया-स्लोवेनिया, मॉन्टेनिग्रो, पोलैंड, रोमानिया, सर्बिया और नॉर्थ मेसिडोनिया।

हर साल इसकी मीटिंग होती है और यह हर सदस्य देश में आयोजित की जाती हैं। हालांकि, कोविड-19 के चलते पिछली साल इसका आयोजन नहीं किया जा सका था। 5 साल पहले जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में चीन और इस संगठन के सदस्य देशों के बीच म्युचुअल ट्रेड यानी आपसी कारोबार करीब 58.7 अरब डॉलर था। इन देशों में चीन करीब 8 अरब डॉलर इन्वेस्ट कर चुका है।

लिथुआनिया को क्या दिक्कत
2019 में लिथुआनिया के विदेश विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन इस संगठन के जरिए पूर्वी यूरोपीय देशों में जासूसी कर रहा है। वो नेटो और यूरोपीय संघ में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहा है। इसके बाद से ही संगठन में दरार आनी शुरू हो गई थी। अब ये माना जा रहा है कि कुछ और देश भी इस ब्लॉक को छोड़ सकते हैं। लिथुआनिया ने भी बाकी देशों से इस संगठन को छोड़ने की अपील की है।

चीन की परेशानी
यूरोप के कई देश चीन में उईगर मुस्लिमों के खराब हालात और उन्हें टॉर्चर किए जाने का सवाल उठाते रहे हैं। चीन के इस रवैये के खिलाफ लिथुआनिया भी आवाज उठा चुका है। चीन को उईगर मुस्लिमों से जुड़े सवाल हमेशा परेशान करते रहे हैं।

लिथुआनिया एक और वजह से चीन को खटक रहा था। पिछले साल लिथुआनिया सरकार ने ताइवान के साथ ट्रेड रिलेशन्स बढ़ाने का फैसला किया था। चीन ने इसका विरोध किया था। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है।

अमेरिकी प्रभाव
कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लिथुआनिया पर अमेरिकी दबाव था और इसके चलते ही उसने चीन के दबदबे वाले इस संगठन को छोड़ने का फैसला किया। हालांकि, अमेरिका ने अब तक इस बारे में कोई बयान जारी नहीं किया। लेकिन, इतना तय है कि अमेरिका अब चीन के विस्तारवादी रवैये पर शिकंजा कसने के लिए नए दोस्तों की तलाश कर रहा है। इसमें क्वॉड भी शामिल है, जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं।

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