कोरोना में टूटती परंपराएं: माहाराष्ट्र के बीड में महिला के निधन के बाद 6 बेटियों ने उन्हें कंधे पर उठाकर श्मशान तक पहुंचाया, सभी ने मिलकर दी मुखाग्नि

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बीड11 मिनट पहले

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बेटियों को श्मशान की ओर बढ़ता देख गांव के कुछ लोग उनकी मदद को आगे बढे, लेकिन उन्होंने उन्हें मना कर दिया है। - Dainik Bhaskar

बेटियों को श्मशान की ओर बढ़ता देख गांव के कुछ लोग उनकी मदद को आगे बढे, लेकिन उन्होंने उन्हें मना कर दिया है।

हिन्दू परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति के मृत होने पर परिवार का पुरुष सदस्य ही उसका अंतिम संस्कार करता है, लेकिन वैश्विक महामारी यानी कोरोना के इस संकट काल में अब यह भी परंपरा बदलती नजर आ रही है। बीड जिले के शिरूर तालुका में एक महिला के निधन के बाद उसकी 4 बेटियों ने उसे कंधे पर उठाकर श्मशान तक पहुंचाया और अपने हाथों चिता को आग दी।

बेटियों का यह प्रयास इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां के जंबा गांव में रहने वाली लक्ष्मीबाई कांबले की गुरुवार शाम वृद्धावस्था की वजह से मौत हो गई थी। उन्हें कोरोना संक्रमण नहीं था, इसके बावजूद गांव के सदस्य उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए आगे नहीं आए। लक्ष्मीबाई की 6 बेटियां, 6 दामाद और कई पोते और पोतियां हैं। उनका पुत्र नहीं होने के कारण उनके दामाद अंतिम संस्कार करने वाले थे, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए शुरू में जब कोई नहीं आया तो बेटियों ने खुद मां की अर्थी को कंधा देने मन बनाया।

बेटियों के कंधे पर मां की अर्थी आगे आए लोग
सुनीता केदार, विमल केदार, शशिकला केदार, शकुंतला पवार. कचराबाई खंडागले और भीमाबाई मोरे अपनी मां को कंधे पर उठाकर श्मशान की ओर निकली तो गांव के कुछ और लोग भी अर्थी को कंधा देने के लिए आगे बढ़े, लेकिन बेटियों ने न सिर्फ उन्हें मना किया बल्कि श्मशान पहुंचकर पूरे विधान से उनका अंतिम संस्कार किया।

6 बेटियों ने अपने हाथ से अपनी मां को मुखाग्नि दी है।

6 बेटियों ने अपने हाथ से अपनी मां को मुखाग्नि दी है।

बेटियों ने नहीं कम होने दिया मां का स्वाभिमान
सुनीता ने बताया, ‘हमारी मां ने पूरे स्वाभिमान के साथ हमारा पालन पोषण किया। उनकी अंतिम यात्रा में भी हम उनका स्वाभिमान कम नहीं होने देंगे। उनकी अंतिम यात्रा में जो भी भागीदार बने उनका भी शुक्रिया और जो नहीं शामिल हुए उनसे कोई शिकायत नहीं है। बस हम यही कहना चाहते हैं कि यह समय एकजुट होने का है और अगर हम साथ मिलकर रहेंगे तो यह समय भी समाप्त हो जाएगा।’

बेटा कर सकता है, तो बेटी क्यों नहीं
लक्ष्मीबाई की दूसरी बेटी विमल केदार ने बताया,’समाज में महिलाएं अब बराबरी से आगे बढ़ रही हैं। अगर एक बेटा अपनी मां को मुखाग्नि दे सकता है तो हमें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए।’ विमला ने यह भी बताया कि उनके मां शुरू से यह चाहती थीं कि उनके निधन के बाद उनकी बेटियां ही उनका अंतिम संस्कार करें।

इनपुट : रोहित देशपांडे, बीड

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