दिखावे के हमदर्द: 57 मुस्लिम देश और करीब 180 करोड़ आबादी, 90 लाख की जनसंख्या वाले इजराइल को रोकने में नाकाम; वजह- सबको अपनी फिक्र


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रियाद/नई दिल्ली2 घंटे पहलेलेखक: त्रिदेव शर्मा

इजराइल-फिलीस्तीन के बीच 11 दिन चली जंग से दुनिया फिक्रमंद रही। अमन बहाली की सबसे ज्यादा आवाजें मुस्लिम देशों की तरफ से आ रही थीं, लेकिन ये भी सच है कि ये सब जुबानी-जमाखर्च साबित होती रहीं। इन सबके बीच इस्लामी देशों के एक संगठन की काफी चर्चा हुई। इसके नाम में तो दम दिखता है, लेकिन काम में नहीं। नाम है – ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन। आमतौर पर इसे OIC कहा जाता है। लेकिन, इसकी कथनी और करनी के फर्क का आलम जब आप समझेंगे तो यकायक मुंह से निकलेगा – Oh I See….

तो चलिए, इस OIC और Oh I See के बीच अब तक के सफर को समझते हैं। और ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों अरब देशों के अरबों पेट्रो डॉलर्स पर पलने वाला यह संगठन कभी फिलीस्तीन की मदद नहीं कर पाया। क्यों फिलीस्तीनी मजलूम और मजबूर इजराइल के हाथों मारे जाते रहे हैं। हालांकि, इजराइल के भी अपने तर्क हैं। लेकिन, यहां बात फिलहाल OIC की।

पहले OIC पर एक नजर
1967 की अरब-इजराइल जंग के बाद मई 1971 में OIC की स्थापना हुई। आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका मकसद ही फिलीस्तीन की मदद करना और उसे इजराइल के साये से मुक्त कराना था। शुरुआत 30 देशों से हुई थी, आज 57 देश इसके सदस्य हैं। अमूमन हर दौर में सऊदी अरब का ही इस पर दबदबा रहा। इसकी दो वजह हैं। पहली- मुस्लिमों की आस्था के दो सबसे बड़े केंद्र यानी मक्का और मदीना सऊदी में ही हैं। दूसरी- आर्थिक तौर पर कोई दूसरा मुस्लिम देश सऊदी के आसपास भी नहीं फटकता।

पाकिस्तान के सीनियर जर्नलिस्ट रिजवान राजी ने पिछले दिनों अपने यूट्यूब चैनल पर कहा था- OIC मजहबी आधार पर बना था। इससे ज्यादा उम्मीदें पालना ठीक नहीं। वेस्टर्न वर्ल्ड के सामने तो यह मुंह खोलने में भी डरता है।

1 मार्च 2019 को OIC समिट में भारत को बतौर स्पेशल गेस्ट इनवाइट किया गया था। पाकिस्तान ने इसका विरोध किया था। तब की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसमें शिरकत की थी। सऊदी ने पाकिस्तान की आपत्ति खारिज कर दी थी।

OIC की हकीकत: बस एक उदाहरण से समझिए
50 साल से ज्यादा हुए OIC को बने हुए। ये इजराइल को झुकाने और फिलीस्तीन को उसका वाजिब हक दिलाने में कितना कामयाब रहा? इसे बस एक उदाहरण से समझ लीजिए, तस्वीर साफ हो जाएगी। 1948 में फिलीस्तीन के दो हिस्से हुए। कुल जमीन का 48% हिस्सा फिलीस्तीन और 44% इजराइल को मिला। 8% यरुशलम के हिस्से आया और ये UNO की सरपरस्ती में आ गया। आज फिलीस्तीन सिकुड़कर महज 12% जमीन पर है। इसकी 36% जमीन इजराइल हड़प कर चुका है। सवाल ये कि क्या करता रहा OIC…?

नाकामी के लिए अरब वर्ल्ड ही जिम्मेदार
खाड़ी देश कहें, अरब मुमालिक कहें या फिर गल्फ स्टेट्स। OIC पर असली दबदबा तो इन्हीं का रहा। और ये हैं क्या? ज्यादातर देशों में राजशाही है। पीढ़ी दर पीढ़ी, एक ही परिवार शासन करता है। सऊदी अरब की ही बात कर लें। यहां का शाही खानदान अपनी सुरक्षा को ही लेकर हमेशा परेशान रहता है। 60 साल से यहां अमेरिकी फौज का एयरबेस और मिलिट्री स्टेशन है। हर टेक्निकल सपोर्ट के लिए ये पश्चिमी देशों पर निर्भर हैं। शिया मेजॉरिटी वाले ईरान से खतरा बना रहता है। लिहाजा, हर साल करोड़ों डॉलर के हथियार खरीदते हैं। फ्रांस की शार्ली हेब्दो मैगजीन ने जब इस्लाम से संबंधित विवादित कार्टून छापे तो सऊदी सरकार ने बयान जारी कर रस्म अदायगी कर ली।

गुरुवार (20 मई) देर रात मिली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल-फिलीस्तीन जंग में 230 लोग मारे जा चुके हैं। इजराइल में 10 लोगों की मौत हुई। फिलीस्तीन के गाजा में मरने वालों का आंकड़ा 220 से भी ज्यादा हो सकता है।

गुरुवार (20 मई) देर रात मिली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल-फिलीस्तीन जंग में 230 लोग मारे जा चुके हैं। इजराइल में 10 लोगों की मौत हुई। फिलीस्तीन के गाजा में मरने वालों का आंकड़ा 220 से भी ज्यादा हो सकता है।

चुप क्यों रहता है सऊदी अरब
इसकी एक ही वजह है- सिर्फ अपना स्वार्थ देखना। दुनिया के हर अमीर देश में शाही परिवार या यहां के लोगों ने अरबों डॉलर का इन्वेस्टमेंट कर रखा है। अमेरिका और यूरोप में प्रॉपर्टीज हैं। फिर सल्तनत कायम रखने के लिए भी अमेरिका पर ही निर्भर हैं, क्योंकि बिना उसके इनका गुजारा भी नहीं। लगभग यही हाल, UAE या दूसरे अरब देशों का है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट सुशांत सरीन कहते हैं- OIC इसलिए नाकाम रहा, क्योंकि इसके हर मेंबर के अपने हित हैं। ये इकोनॉमिक भी हैं और डिप्लोमैटिक भी। आप तुर्की को ही ले लीजिए। इजराइल के साथ उसके गहरे ट्रेड रिलेशन हैं। जब इस्लाम से संबंधित कोई मुद्दा उठता है तो कभी डिप्लोमैट को वापस बुला लेता तो कभी बयानबाजी करके चुप हो जाता है। लेकिन, अपने हित हमेशा आगे रखता है। सऊदी अरब और अमेरिका के स्ट्रैटेजिक रिलेशन्स हैं। समझदार देश बैलेंस बनाकर चलते हैं। तुर्की और इजराइल के बीच 2018 में आपसी कारोबार 6.2 बिलियन डॉलर था।

पाकिस्तान को चने के झाड़ पर चढ़ा देता है तुर्की
सरीन के मुताबिक- पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया ने कश्मीर मुद्दे पर 2019 में एक अलग इस्लामिक प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश की थी। इसके जरिए वे OIC को चैलेंज करना चाहते थे। लेकिन, जैसे ही सऊदी अरब और UAE ने फटकार लगाई तो यह गुब्बारा फट गया। दरअसल, तुर्की बहुत चालाकी से काम करता है। वो पाकिस्तान को लफ्फाजी करने के लिए आगे कर देता है, लेकिन खुद इजराइल और अमेरिका से हर तरह के रिलेशन बनाकर रखता है। पाकिस्तान में OIC को ‘मुस्लिम उम्माह’ भी कहा जाता है।

सरीन आगे कहते हैं- नॉर्मल रियासतें ऐसे ही बर्ताव करती हैं। वो अपने हित देखती हैं। सऊदी या दूसरे मुस्लिम देश भी यही करते हैं। वे भी पैगम्बर को दिल में रखते हैं। लेकिन, पाकिस्तानी मजहब के नाम पर अपने ही देश में आग लगा देते हैं। तुर्की में तो पाकिस्तानियों को रोजगार मिलता नहीं है। जबकि, सऊदी और UAE में 20 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी काम करते हैं। लिहाजा, ये OIC को चैलेंज करने का सोच भी नहीं सकते।

तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया ने 2020 में OIC जैसा मुस्लिम देशों का संगठन बनाने की कोशिश की थी। वे एक इस्लामिक टीवी चैनल भी खोलना चाहते थे। सऊदी के सख्त तेवरों ने उनके अरमान ठंडे कर दिए थे।

तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया ने 2020 में OIC जैसा मुस्लिम देशों का संगठन बनाने की कोशिश की थी। वे एक इस्लामिक टीवी चैनल भी खोलना चाहते थे। सऊदी के सख्त तेवरों ने उनके अरमान ठंडे कर दिए थे।

अरब देशों का खेल समझिए
सिर्फ चार महीने पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक इंटरव्यू में कहा था- हमारे कुछ दोस्त पाकिस्तान पर पर इजराल को मान्यता देने का दबाव डाल रहे हैं। यहां ये भी जान लीजिए कि पाकिस्तान ने एक मुल्क के तौर पर अब तक इजराइल को मान्यता नहीं दी है। इमरान ने कई बार पूछे जाने के बाद भी इन देशों का नाम बताने से इनकार कर दिया था। लेकिन, हर कोई समझ गया कि ये मुल्क अमेरिका, सऊदी अरब, UAE और बहरीन हैं। यही देश पाकिस्तान को दिवालिया होने से भी बचाते रहे हैं।

इजराइल को कबूल करते अरब देश
सऊदी अरब के इजराइल से डिप्लोमैटिक रिलेशन नहीं हैं। लेकिन, न्यूयॉर्क टाइम्स ने सितंबर 2020 में बताया था कि वो दूसरे अरब या मुस्लिम देशों पर इजराइल को मान्यता देने का दबाव डाल रहा है। तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इसमें साथ दिया और ‘अब्राहम अकॉर्ड’के जरिए UAE, बहरीन, सूडान और मोरक्को ने भी इजराइल को मान्यता दे दी। टर्की और इजराइल के संबंध तो 1949 से हैं। देर-सबेर कुछ और मुस्लिम देश भी यही करेंगे।

गाजा पट्टी में करीब 20 लाख लोग रहते हैं। इजराइली बमबारी से यहां बुनियादी सुविधाएं भी तबाह हो चुकी हैं। इलाके में बिजली और पानी की सप्लाई ठप हो चुकी है।

गाजा पट्टी में करीब 20 लाख लोग रहते हैं। इजराइली बमबारी से यहां बुनियादी सुविधाएं भी तबाह हो चुकी हैं। इलाके में बिजली और पानी की सप्लाई ठप हो चुकी है।

नेतन्याहू- MBS की गुप्त मुलाकात
23 नवंबर 2020 को ‘टाइम्स ऑफ इजराइल’ ने एक अहम खुलासा किया। इसके मुताबिक- इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बेहद गुपचुप तरीके से एक प्राईवेट जेट से सऊदी अरब के शहर नियोम गए थे। उनके साथ खुफिया एजेंसी मोसाद के चीफ योसी कोहेन भी थे। नेतन्याहू यहां 5 घंटे रुके। इस दौरान उन्होंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से मुलाकात की। तब के अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो भी मौजूद थे। ट्रैवल रिकॉर्ड से इस यात्रा की पुष्टि भी हो गई। हालांकि, इजराइल या सऊदी ने कोई रिएक्शन नहीं दिया था। लेकिन, ये तय हो गया था कि कुछ खिचड़ी जरूर पक रही है।

तो अब आगे क्या
इजराइली फिलीस्तीन जंग इस बार 11 दिन चली। अब सीजफायर का ऐलान हुआ है। इस दौरान OIC बयान और निंदा करने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाया, जबकि ये UN के बाद सबसे बड़ा संगठन है। UN सिक्योरिटी काउंसिल में इजराइल के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव को अमेरिका ने एक ही हफ्ते में तीन बार वीटो करके इजराइल के साथ अपनी पक्की दोस्ती फिर जाहिर कर दी थी।

लब्बोलुआब यह कि सीजफायर अमेरिकी कोशिशों के बाद हुआ। OIC के बूते का कुछ नजर नहीं आया। पहले की तरह अब भी अरब देश अपने हित देखते और साधते रहेंगे। पाकिस्तान और तुर्की चीखते-चीखते हांफ जाएंगे और फिर चुप हो जाएंगे। सवाल यह कि क्या तब तक मासूम फिलीस्तीनी इजराइली हमलों का शिकार बनते रहेंगे?

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