महाराष्ट्र के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट: मौत के डर से किसी ने नहीं लगवाई वैक्सीन, गांव से कोई बाहर नहीं जाता, बाहर के लोगों पर भी पाबंदी

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महाराष्ट्र और कनार्टक सीमा पर भीमा-सीना नदी के किनारे छोटा सा गांव है धारसंग। सोलापुर जिले की अक्कलकोट तालुका के इस गांव में करीब 124 परिवार रहते हैं। यहां की कुल आबादी करीब 500 लोगों की है। ताज्जुब की बात है कि महाराष्ट्र में कोरोना की डरावनी तस्वीर देखने के बाद भी इस गांव के किसी भी व्यक्ति ने वैक्सीन नहीं ली है।

ऐसा नहीं है कि यहां वैक्सीन की सुविधा नहीं है। दरअसल, गांववालों में एक अजीब सी गलतफहमी है। यहां के लोगों का कहना है कि वैक्सीन ली तो मर जाएंगे। पढ़ें सोलापुर के धारसंग से मनोज व्हटकर और मंगेश फल्ले की रिपोर्ट…

स्थानीय स्तर पर भी प्रशासन इन्हें वैक्सीन लेने के लिए इसके फायदे बताती नहीं थकती लेकिन लोग अपनी बात पर कायम हैं। ग्राम पंचायत में चपरासी रमेश कोली बताते हैं कि कर्नाटक के भागुणकी गांव में 100% वैक्सीनेशन हुआ है। यहां के लोगों का कहना है कि उसके बाद भी 170 लोगों की जान चली गई है। इसलिए धारसंग के लोग वैक्सीन से डरे हुए हैं। यही कारण है कि अब तक कोई भी वैक्सीन लगवाने के लिए सामने नहीं आया।

वैक्सीन की गलतफहमी के बावजूद गांव ने खुद को आइसोलेट किया
खैर, वैक्सीन को लेकर इन्हें जागरूक करने की जरूरत है, जिसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रशासन काम भी कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है कि इन्हें कोरोना का डर नहीं है। गांव वालों ने संक्रमण से बचने के लिए अपने स्तर पर पुख्ता इंतजाम किए हुए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव का कोई भी सदस्य किसी दूसरे गांव नहीं जाता और न ही किसी बाहरी को गांव के अंदर आने की अनुमति है। एक तरह से इस गांव ने खुद को ही आइसोलेट कर रखा है। इसी का नतीजा है कि अब तक यहां किसी को भी कोरोना नहीं हुआ है।

गांव को पिछले साल एक ऑक्सीमीटर मिला वो भी खराब
धारसंग गांव से 18 किलोमीटर दूर कोरेस गांव है जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वैक्सीनेशन की सुविधा है। गांव की आशा वर्कर रेहमत बिल लालसा शेख बताती हैं कि गांव में 500 लोग हैं, जिसमें आधी आबादी बुजुर्गों की है। इनकी जांच के लिए पिछले साल गांव को एक ऑक्सीमीटर दिया गया, वह भी खराब हो चुका है।

रेहमत रोज करीब 5 घरों में जाकर लोगों का हालचाल लेती हैं और उन्हें कोरोना से जुड़ी हर जानकारी मुहैया करवाती हैं। आप कुशल तो गांव कुशल इसी मंत्र को वो हर एक ग्रामीण को बताती हैं। गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वैक्सीन दी जा रही है, लेकिन मौत के डर से आज तक एक भी ग्रामवासी टीका लेने नहीं गए। कहते हैं, जीते जी मरना है क्या?

हत्तरसंग और आलगी गांव में नाव ही सहारा, यहां स्वास्थ्य सुविधा नहीं
यहां के एक युवा नागेश कोली ने बताया कि गांव में सब कुशल है। किसी को कुछ परेशानी आती है तो सब मिलकर मदद करते है। कोई भी व्यक्ति गांव से बाहर नहीं जाता और किसी बाहर के शख्स को गांव में आने नहीं दिया जाता। इसलिए आज तक कोरोना गांव में प्रवेश नहीं कर पाया। नागेश आगे बताते हैं कि गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। यहां से 8 किमी पर तडवल और 18 किमी की दूरी पर करजगी, मुंढेवाडी गांव है।

हत्तरसंग और आलगी गांव जाने के लिए सड़क नहीं है। नदी पार करने के लिए सिर्फ एक ही सहारा नाव का है। इन गांवों में कोई स्वास्थ्य केंद्र और डॉक्टर भी नहीं है। कोई भी बीमार पड़े तो 35 किलोमीटर दूर नाव से नदी पार कर सोलापुर जाना पड़ता है। गाड़ी से जाने पर 80 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है।

खेल दिखाकर पेट पालते थे, अब कोरोना ने हमसे खेल कर दिया
-खर्डा (अहमदनगर) से मंगेश फल्ले की रिपोर्ट

अहमदनगर के जामखेड से 20 किलोमीटर की दूरी पर खर्डा गांव है। यहां मदारियों की बस्ती है। वही मदारी जो बंदर, भालू और सांप दिखाकर अपना और अपने परिवार की रोजी रोटी चलाते हैं। 76 साल के हुसैन मदारी ने दैनिक भास्कर के टीम को बताया कि सरकार ने वन्य जीव कानून के तहत सांप, बंदर और भालू पालने पर प्रतिबंध लगा दिया है। जैसे तैसे छिपते छिपाते हम खखेल दिखाकर अपना पेट पालते हैं। लेकिन कोरोना ने तो हमसे ही खेल कर दिया। आज तो एक निवाले के लिए भी हम मोहताज हैं। ईद कहां से मनाएं यहां तो खाने के लाले पड़े हैं।

हुसैन बताते हैं कि 44 घरों की मदारी बस्ती में हर परिवार में 7 से 8 सदस्य हैं। सरकार ने भी हमें मरने छोड़ दिया है। हमारी बस्ती में स्वास्थ्य सुविधा तो दूर कोई झांकने तक नहीं आता। कोरोना जांच भी नहीं होती। शुक्र है अब तक हमारी बस्ती में कोरोना ने दस्तक नहीं दी। कोरोना का हमें कोई डर नहीं, लेकिन सुबह का खाना मिले तो शाम को क्या खाएं। इसकी चिंता सताती रहती है।

समाजिक कार्यकर्ता विशाल पवार बताते हैं कि पिछले साल तो इन लोगों के लिए हमने मदद की थी, लेकिन इस बार कोई मदद भी करने को तैयार नहीं है।

बहुरूपीयों का हाल- लोग गांव में आने ही नहीं देते
जामखेड़ तालुका से दस किमी की दूरी पर भवरवाड़ी गांव है। वकील, डॉक्टर, पुलिस ऐसे कई लोगों का वेश बनाकर अपना पेट पालने वाले बहुरूपीयों को भी खाने के लाले पड़ रहे हैं। यहां के विजय चौगुले बताते हैं कि झोपड़ी में स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है। पुलिस के वेश में कला दिखाकर हम लोग कुछ कमा पाते थे, लेकिन कोरोना के डर से लोग गांव में नहीं आने देते। इंट भट्ठों, गन्ना कटाई और पत्थर तोड़ने का काम करके कुछ आमदनी हो जाती थी, अब तो वह भी बंद है।

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