Bhojpuri: कोलकाता के मिठाइयन के जादुई संवाद, रउओ लेबे लागब चटकारा

[ad_1]

मिठाई के चर्चा चलते बंगाली मिठाई के बात दिमाग में आइए जाला. अठाइस गो अइसन मिठाई बाड़ी सन जौना के चर्चा ना कइल जाउ त बंगाल के मिठाई प्रसंग अधूरे रहि जाई. मिठाई के नांवो पढ़ल एगो सुख ह. त गिनत जाईं- मिष्टी दोई (मीठका दही), रसगुल्ला, राजभोग, संदेश, मालपुआ, रसमलाई, पाएस (खीर), पंतुआ, इमरती, लेंगचा, छेना के जिलेबी, पातीशाप्ता, चमचम, जयनगर के मोआ, मिहिदाना, खीर कदम, सार भाजा, दरबेश, काचागोला, चंद्रपुली, काला जाम, निकुटी, नाड़ू, राबड़ी, लंवंगलतिका, लेडीकेनी, सीताभोग, कोलार बोरा, गजा….. रउरा पढ़त, पढ़त थाकि जाइब बाकिर मिठाई के नांव ना ओराई. एकरा अलावा गोलापी (गुलाबी) पेड़ा, राताबी संदेश, आबार खाबो (अनुवाद- फेर खाइब), गोलापी संदेश, देश गोरब, दोरबेश, मोनमतानो, मोनोहोरा, नोलेन गुरेर संदेश, राइस बॉल, चोको तूफान, सुगर फ्री संदेश, दिलखुश, लालमोहन, प्रभु भोग……. अब तनी रुकि जाईं . एमें सबसे दिलचस्प बात ई बा कि लेडीकेनी ब्रिटिश गवर्नर लार्ड केनिंग के पत्नी के नांव पर परल बा. गुलाब जामुन गोल होला आ लेडीकेनी के आकार लंबा होला. लेडीकेनी के रंग गुलाब जामुन नियर रहेला बाकिर रूप रउरा अंगुरी से बड़ आ बहुते मोट रहेला. अंग्रेज त चलि गइले सन बाकिर अवशेष छोड़ि गइल बाड़न स. ए साहेब, काचागोला जदि ढंग से बनल होखे त मन- मिजाज तृप्त क देला. बाकिर खाली काचागोला काहें ऊपर लिखल कुल मिठाइए मन के तृप्ति से सराबोर क दिहन सन. ढेर लोगन के बिचार ह कि मिठाई खाइल माने इंद्रिय जगत के चरम सुख में चलि गइल. अब ओह लोगन के छोड़ीं, जेकरा मीठा पसंदे ना परे. अइसन लोग नमकीन आ चटपटा व्यंजन के व्यसनी होला. एह लोगन के संख्या कम बा. मिठाई खा के चरम आनंद के अनुभूति कइल ऊहे जानी जे मिठाई प्रेमी बा. ढेर लोग त कहेला कि फलाना दोकान के मिठाई खा के आत्मा तृप्त हो जाला. बाकिर आत्मा मिठाई से कइसे तृप्त होई. जाए दीं. आजु मिठाई के बात होखो. आत्मा- परमात्मा के बात बाद में. सही मे मिठाई के नांव सुनते मुंह में पानी आ जाला. हमनी के शरीर के अंत:स्रावी ग्रंथि सूक्ष्म रूप से वाइब्रेट करे लागेली सन. जेकरा सुगर के बेमारी बा, ऊहो शादी- बियाह भा कौनो परोजन में परहेज तूरि देला आ मिठाई के स्वाद में विभोर हो जाला. भले सुगर फ्री संदेश बाजार में बहुते दिन से बिकाता, बाकिर जब परहेज तुरहीं के बा त सुगर फ्री काहें, कुल में से चीखल ठीक बा. ओह बेरा रउरा टोकत रहीं- अरे, रउरा त सुगर बा, ई त रउरा छुअहूं के ना चाहीं. बाकिर के सुनता. कुछ मौका अइसन होखेले सन कि जौन जीभ के नियंत्रण पर लोलुपता के जीत करा देले सन. अइसना लोगन के कमी नइखे जे कबो- कबो खान- पान के परहेज के सीमा, अपना प्रचंड इच्छा के आन्हीं में मेटा देला आ जीत जीभ के होला. रउरा त जानते बानी कि जीभ आ दिमाग के कनेक्शन बड़ा स्ट्रांग ह. कोलकाता में रउरा के अइसन आदमी ढेरे मिल जइहें, जे रोज एगो मिठाई ना खइहें त उनुकर दिन निरर्थक हो जाई. हमनी के देहातो में गुर खा को पानी पिए वाला लोग कम नइखन. देहात में त खांटी गुर मिल जाला, कोलकाता में खांटी गुर ना मिली, चालानी गुर मिली. त मिठाई के महिमा का ह, ई बिना बतवले सब जानेला.बंगाल के कई गो जिला अलग- अलग मिठाइयन खातिर मशहूर बाड़े सन. जइसे- बांकुड़ा- मेचा संदेश खातिर, बर्दवान- सीताभोग, मिहिदाना लेंगचा खातिर, बीरभूम- मोरब्बा आ अचार खातिर, कूचबिहार- जिलेबी खातिर, दार्जिलिंग त चाय खातिर मशहूर बड़ले बा, हुगली- गुपो संदेश खातिर, चंदननगर- जोल भरा खातिर, मालदा- आम सत, रसकदंब खातिर, मुर्शिदाबाद- छानाबोरा, खीरकदम खातिर, कृष्णनगर- सारभाजा आ जयनगर- मोआ खातिर मशहूर ह. आईं आजु मिठाई के इतिहास में झांकल जाउ. दस्तावेज बतावतारे सन कि सन 1498 में वास्को डिगामा भारत आइल रहे. सन 1511 में पुर्तगाली बंगाल में अइले सन. पुर्तगाली समुझि गइलन स कि बंगाल व्यापार खातिर बहुते सही जगह बा. ऊ कुल आपन कल- कारखाना लगा दिहले सन. धीरे- धीरे ओकनी के संख्या बढ़ि के पांच हजार से भी अधिका हो गइल. पुर्तगालियन के पनीर बहुते पसंद रहे. पनीर के रेसिपी ऊ बंगाल में ले अइलन स. एने भारतीय लोगन खातिर दूध फारि के छेना आ पनीर बनावल आसान रहे. भारतीय लोगन के पनीर आ छेना के व्यापार बढ़े लागल. रउरा जानते बानी बंगाल के हलुवाइन दिमाग बड़ा खोजी होखेला. त बंगाली हलुवाई छेना के संगे तरह- तरह के प्रयोग शुरू कइल लोग. कलकत्ता (ओह घरी कलकत्ते नांव रहे, अब कोलकाता हो गइल बा) के बाग बाजार के एगो प्रतिष्ठित हलुवाई रहले नवीन चंद्र दास (बांग्ला उच्चारण- नोबीन चंद्रो दास). उनुकर दोकान “दास स्वीट्स” के बड़ा नांव रहे. पुर्तगालियन में छेना आ पनीर के लोकप्रियता आ मांग देखि के सन 1868 में नवीन चंद्र दास एगो प्रयोग कइले. छेना के ऊ गोल आकार देके ऊ चीनी के चाशनी में उबाल दिहले. जौन मिठाई तेयार भइल ओकर नांव रखाइल- रसगुल्ला (बांग्ला उच्चारण- रोसोगोल्ला). ई मिठाई लोगन के एतना पसंद परल कि एकर ख्याति दूर- दूर तक फइल गइल. त एह तरे रसगुल्ला के अविष्कार भइल. त आजुओ कहाला कि रसगुल्ला के अविष्कारक हउवन नवीन चंद्र दास.
एगो अउरी रोचक प्रसंग बा. रसगुल्ला के अविष्कार के लेके उड़ीसा आ पश्चिम बंगाल में बहुत साल तक खींचतान चलल. उड़ीसा कहलस कि ई दावा गलत बा कि रसगुल्ला के अविष्कार पश्चिम बंगाल में भइल बा, एकर अविष्कार त उड़ीसा में भइल रहे. कई साल तक दूनों सरकारन के मंत्री लोग आपन- आपन बात मीडिया में आ भारत सरकार के सामने राखल लोग. बहुत रिसर्च आ विशेषज्ञन के राय लिहला का बाद अंत में भारत सरकार इंटेलेक्चुअल प्राप्रटी के नियम के तहत जीआई टैग माने जियोग्राफिकल इंडिकेशन पश्चिम बंगाल के दिहलस. जियोग्राफिकल इंडिकेशन माने भौगोलिक संकेतक. कौनो खान- पान भा अन्य चीज के GI टैग बतावेला कि ई सामान के ओरिजिन अमुक जगह ह. जीआई कब शुरू भइल? त दिसंबर, 1999 में हमनी के देश के संसद माल के भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण आ संरक्षण) अधिनियम, 1999 पारित कइलस. अंग्रेजी में एकरा के Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहल जाला. एकरा के सन 2003 में लागू गइल रहे. एकरा तहत भारत में पावल गइल यूनीक प्रॉडक्ट खातिर जी आई टैग देबे के सिलसिला शुरू भइल. त फाइनली रसगुल्ला के लड़ाई में पश्चिम बंगाल जीत गइल. ओकरा के जीआई टैग मिलि गइल. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



[ad_2]

Source link

Live Sachcha Dost TV

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *