Bhojpuri: बंगाल में “जात्रा” के परंपरा, जानीं का ह एकर इतिहास


जात्रा एक तरह के नौटंकी ह. खुला आसमान के नीचे एगो आकर्षक स्टेज, सुंदर प्रकाश आ ध्वनि व्यवस्था. हमनी के देश में प्रसिद्ध नाटक भा लोकनाट्य परंपरा- जात्रा, रामलीला, रासलीला, स्वांग, नौटंकी वगैरह रहल बाड़ी सन. जात्रा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा आ बंगाल से सटल बिहार के हिस्सन में ढेर प्रचलित बा. बांग्लादेश में भी ई खूब प्रचलित बा. त जात्रा संगीत थिएटर ह, जौना में अभिनय का संगे संगीत, गायन आ नाटकीय बाद- बिबाद होला. जात्रा के बिषय आ टाइटिल अइसन रहेला कि लोग ओसे आकर्षित होखसु. पहिले जात्रा के प्रस्तुति के नांव रहत रहल ह- बेहुला, मनसा. माने बेहुला भा मनसा के कथा प्रस्तुत कइल जाई. सन 2001 ले खाली कोलकाता में 300 जात्रा कंपनी रहली सन. पहिले जात्रा कोलकाता में भी होत रहल ह. बाकिर अब ग्रामीण इलाकन में होला, महानगर से दूर जिला वगैरह में होला. बांग्ला भाषा में यात्रा के उच्चारण जात्रा होला. यात्रा के अंग्रेजी में अर्थ होई- जर्नी. कथी के जर्नी? त भगवान के ओर जर्नी. पंद्रहवीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु कृष्ण भजन गावत आ नाचत अपना मंडली का संगे नगर परिक्रमा नियर करसु. जात्रा के उत्पत्ति चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन के उदय से मानल जाला. किताबन में उल्लेख बा कि ओह घरी “रुक्मिणी हरण” नाटक भइल रहे जौना में चैतन्य महाप्रभु खुद रुक्मिणी के अभिनय कइले रहले. भगवान कृष्ण रुक्मिणी के हरण कके ले अइले. चैतन्य महाप्रभु चरम भक्ति के आज तक अनूठा उदाहरण मानल जाले. बाकिर आज के जात्रा के स्वरूप सामाजिक विषय पर केंद्रित हो गइल बा. कभी- कभी राजनीतिक टच भी आ जाला. भले ई टच सांकेतिक रहेला. प्राचीन प्रस्तुति के “पौराणिक पाला” कहल जाला आ बाकी प्रस्तुति के “सामाजिक पाला”. जात्रा में संगीतकार आ गायक स्टेज के दूनो ओर बइठे ला लोग. एक्टर ऊहे चुनल जाला जेकर आवाज बुलंद होखे आ जे नाटकीयता का संगे डायलॉग बोल सके. देखे में भी सुंदर रंग- रूप होखे. एमें सूत्रधार नियर दू गो कैरेक्टर रहेले सन. एगो कैरेक्टर ह- “विवेक” (कांसेंस भा चैतन्यता) आ दोसर कैरेक्टर ह- नियति (भाग्य). विवेक पुरुष पात्र ह आ नियति स्त्री पात्र. चरित्रन के वर्णन आ का होखे जाता ई बतावेला त नियति चरित्रन के आचरण के प्रति सावधान करेली. चैतन्य महाप्रभु के महासमाधि के बाद उनुकर शिष्य रामानंद राय आ रूपा गोस्वामी, कृष्ण लीला पर केंद्रित जात्रा प्रस्तुत कइल लोग. पुरी के राजा प्रताप रूद्रदेव, चैतन्य महाप्रभु के शिष्य लोगन के बड़ा सम्मान करसु. पुराना जमाना में राम जात्रा, कृष्ण जात्रा, शिव जात्रा के नाम से जात्रा के प्रस्तुतिकरण के उल्लेख भी मिलल बा. आधुनिक जात्रा परंपरा के नतून जात्रा (नवीन जात्रा) के नांव से जानल गइल. त नतून जात्रा परंपरा में एगो रहे नट्ट कंपनी. ओकर एगो प्रसिद्ध अभिनेता रहले- शांति गोपाल. अलग- अलग जात्रा में शांतिगोपाल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आ हिटलर के अइसन अभिनय कइले कि लोग आजु ले याद करेला. स्त्री पात्रन में बीणा दासगुप्ता (बांग्ला में उच्चारण- बीना) के नांव प्रसिद्ध रहे. लेनिन पर केंद्रित जात्रा भी भइल रहे. इंडियन पीपुल्स थि‍एटर एसोसिएशन (इप्टा) के कम्युनिस्ट पार्टी के सपोर्ट रहे. त ऊ जात्रा के उपयोग कम्युनिस्ट विचारधारा के फइलावे में कइल लोग. इप्टा के शंभु मित्र प्रसिद्ध नाटककार रहले ह. उनुकर “बहुरूपी” कंपनी वैचारिक जात्रा प्रस्तुत कइलस. फणिभूषण विद्याविनोद के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिलल. जानकार लोग कहेला कि पश्चिमी देसन के प्रभाव परला का बाद जात्रा के स्वरूप राजनीतिक आ सामाजिक हो गइल. कोलकाता में जात्रा उत्सव सन 1961 से शुरू भइल. हर सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी, जात्रा उत्सव के जारी रखलस. एगो अउरी बात बा. पहिले एक्टर, मैनेजर भा गायक लोग जात्रा चलावत रहल ह लोग. बाकिर आजकाल जात्रा पूरी तरह व्यावसायिक हो गइल बा. कई गो जात्रा कंपनी बिजनेस केंद्रित हो चुकल बाड़ी सन. जब अस्सी के दशक में डकैत फूलन देवी के खूब नांव रहे त जात्रा कंपनी उनुका पर केंद्रित जात्रा कइली सन आ ओमें खूब भीड़ होखे. आज के स्थिति ई बा कि देश- विदेश में कौनो प्रमुख घटना होखे, जात्रा कंपनी तुरंत ओकरा पर जात्रा तेयार क देली सन. एक महीना के भीतर ओह बिषय पर जात्रा के प्रस्तुति लोगन के देखे के मिल जाला. पहिले लाइटिंग आ साउंड कामे भर रही, बाकिर अब तक जात्रा में रंगीन चकाचौंध आ गइल बा.जात्रा में कौन- कौन वाद्य यंत्र के प्रयोग होला- पहिले ढोलक, पखावज, हारमोनियम, तबला, बांसुरी, तुरही, मजीरा, करताल, वायलिन, क्लेरिनेट वगैरह के प्रयोग होत रहल ह. अब एमें आर्केस्ट्रा वाला वाद्ययंत्र भी शामिल हो गइल बाड़े सन. एसे आवाज तेज आवे लागल बा. पुरान लोग एतना तेज आवाज वाला थिएटर ना पसंद करे. बाकिर नई पीढ़ी के पसंद बा. मूल जात्रा के पहिचान ह कि ओमें राग- रागिनी के साधे वाला गायक आ वादक रहे. शास्त्रीय संगीत आ लय पर केंद्रित गीत रहे. आम तौर जात्रा चार घंटा के होला. एमें शुरू के एक घंटा त संगीत आ गायन में जाला ताकि लोग जुटि जाउ तब जात्रा शुरू होखो. पहिले के जात्रा काव्यमय रहत रहल ह. माने संवाद गा के बोलल जात रहल ह. बाकिर अब नाटकीय ढंग से बोलि के प्रस्तुत कइल जाला. जात्रा के नया स्वरूप नई पीढ़ी के पसंद बा. जात्रा में अबो गायन पक्ष प्रधान रहेला. बीच- बीच में कौनो महिला कलाकार के मोहक नृत्य आ हास्य कार्यक्रम चलत रहेला. ताकि दर्शक के आकर्षण बरकरार रहो. जात्रा सितंबर महीना से शुरू होला आ बरसात के पहिले खतम हो जाला. काहें से कि एकर प्रस्तुति ओपेन थिएटर मे होला, खुला आसमान के नीचे. बरसात में एकर प्रस्तुति संभव नइखे. कोरोना काल में जात्रा परंपरा पर गहिर धक्का लागल बा. बाकिर ई मंदी त विश्वव्यापी बा. एकरा पर कुछ कइल ना जा सकेला. आखिरकार भीड़ से बचेके बा. आ थिएटर त भीड़ के आमंत्रित करेला. त सार्वजनिक मंच वाला कार्यक्रम के धक्का लगबे करी. सब ईहे कामना आ प्रार्थना करता कि ई कोरोना जल्दी बिला जाउ आ फेर कबो एक नांवो ना सुनाउ. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)





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