Bhojpuri: केहू के लाश गंगा में दहsता, केहू के जले के बा इंतजार; का कोरोना काल आदमी के आदमी बना दी?

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कोरोना पॉजिटिव होके कोरोना प लिखल आसान ना होला. हाथवा काँपे लागेला. काँपतो बा. लैपटपवा प बइठत बानी आ लिखे खातिर जोर मारत बानी त आँखी के सोझा अइसन केतना चेहरा नाच जाता जे आज से दस दिन पहिले साथे हँसत-बोलत-बतियावत रहे आ आज ओह में से केहू के अस्थि विसर्जित कइल जाता, केहू के लाश गंगा जी में दहsता त केहू के लाश श्मशान घाट प अपना बारी के इन्तजार में बा. धक्क से जीव हो जाता. आँख भर जाता. शब्द धुंआये लागsता. दिमाग खाली हो जाता. घंटन लैपटॉप के सामने बइठल रहला के बादो कुछ लिखात नइखे. दोसरा हाथ में मोबाइल बा. फेसबुक से भागल रनी ह. फेर फेसबुक प आ गइनी. शुभचिंतक लोग मना करsता. मन मानत नइखे. आवे के पड़sता. शुतुर्मुग के तरह मुंह होने क लेला से त होई ना. अपना खातिर भा दोसरा खातिर मदद भी एही जी माँगे के बा. कुछ लोग योद्धा के तरह दिन-रात मदद में लागल बा. कुछ लोग गिद्ध के तरह दिन-रात नोचे में लागल बा. सियासी खेला जवन बा तवन अलगे बा. हमरा आपन लिखल एगो ग़ज़ल ईयाद पड़sता – जिनिगी के जख्म, पीर, जमाना के घात बा हमरा गजल में आज के दुनिया के बात बाकउअन के काँव-काँव बगइचा में भर गइल कोइल के कूक ना कबो कतहीं सुनात बा अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के
अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा भूखे टटात आदमी का आँख के जबान केहू से आज कहँवाँ, ए यारे, पढ़ात बा संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा ‘भावुक’ ना बा हुनर कि लिखीं गीत आ गजल का जाने कइसे बात हिया के लिखात बा आदमी ब्रम्हांड के सबसे विवेकशील अउरी सबसे लड़ाकू जीव ह. विवेकशील एहसे कि परिस्थतिकी तंत्र में इंसाने बा जे एतना विकसित भइल बा आ विज्ञान, कला, साहित्य, संस्कृति के क्षेत्र में हर-दिन नया प्रतिमान बनावत बा. लड़ाकू एहसे कि हजारो-हजार साल से मानव जीवन के अस्तित्व बा आ कई बार एकरा पर प्राकृतिक बिपदा आइल बा, महामारी के प्रकोप भइल बा, मानव जनित संकट आ युद्ध से पाला पड़ल बा बाकिर ई सगरी लड़ाई लड़त, बाझत-जूझत आगे निकलल बा आ अपना अस्तित्व के बचवले बा. कोरोना महामारी भी मानव जाति खातिर एगो प्रलय ही बा बाकिर हमनी सभे लड़ रहल बानी, भीड़ रहल बानी आ जरूर जीतब जा. फेसबुक पर लोग खूब एक-दोसरा के शुभकामना देता. प्रार्थना आ दुआ में असर होला, करहीं के चाहीं. बाकिर जे सामर्थ्यवान बा ओकरा अपना हीत-मीत से इहो पूछ लेवे के चाहीं कि काहो दवा-बीरो आ टेस्ट आदि खातिर रूपया-पइसा बा ? काम धंधा चलsता? नोकरी बा कि ? पइसा के काम पइसे से नू होई चनेसर. काश ! आपन देश अइसन हो जाइत कि ईलाज आ पढाई खातिर पइसा के फिकिर में लोग के किडनी डैमेज ना होखित. भूख भी एगो समस्या होला ए चनेसर. खैर अभी त पूरा दुनिया में एकही समस्या बा– कोरोना. बाकी सब समस्या ओही में समा गइल बा. जान है तो जहान है. साल 2019 में चीन में पैदा भइल ई कोरोना वायरस पूरा दुनिया के हिला देले बा. सभ काम धंधा, व्यापार, बाजार, रुक गइल बा. मध्यम वर्ग के बहुलता वाला भारत अब रोटियो खातिर तरसे लागल बा. इ कोरोना जवन पूरा 2020 लीलsलस, 2021 पर भी डीठ गड़वले बा. पिछला साल नया-नया रहे त दवाई भी ना रहे आ रोकथाम के जानकारी भी. फेर पता चलल कि मास्क पहिनी, हाथ धोईं आ सामाजिक दूरी बनाईं त ई भाग जाई. रोग बढ़ल त लोग घर में लुकाइल, सरकार लॉकडाउन लगवलस. कुछ लोग जे थेथर रहे उ लॉकडाउन कइसन होला, ई देखे गइल त ढंग से सोटाइल आ घरे आके हरदी दूध पीयल. खैर, फयदे भइल. हरदी दूध से दरदो भागल, कोरोना से लड़े खातिर देह में प्रतिरक्षो जागल आ अनेरे बहरी निकले के आदतो छूटल. एह बीचे दुनिया भर के वैज्ञानिक एकर वैक्सीन बनावे में जुट गइलन. सितंबर-अक्टूबर ले केस कम होखे लागल त एह शर्त पर लॉकडाउन खुले लागल कि लोग कोरोना रोकथाम के नियम के पालन करी. बाकिर लोग ढीला हो गइल. जहां पुलिस जुर्माना असुले उहाँ मास्क लगावे, जहाँ मीडिया के कैमरा लउके, उहाँ मास्क लगावे. बाद में त कई जगे देह में देह दरकचाए लागल, लोग सोचल कि सार कोरोना एही में चपा के मर जइहें. खैर, जनवरी आवत-आवत वैक्सीन भी आ गइल त लोग के देह में डर-भय पहिलहीं ना रहे, अब ढिठाई अउरी आ गइल. नतीजा भइल कि ओरात-बिलात कोरोना फेर लौट आइल आ ए बेरी दुगुना ताकत से आइल, डबल म्यूटेन्ट वाला, जे में ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका आ कैलिफोर्निया वैरिएन्ट के शक्ति समा गइल. इ महाराष्ट्र, पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में फइले लागल, ओकरा बाद दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बंगाल, हरियाणा आ दक्षिण के राज्यन में आपन पैर पसरलस. बाकिर लोग में डर ना आइल. गाँव में लोग कहे कि भाक मरदे, कवनो कोरोना ओरोना नइखे, चुनाव के रैली होता, लोग धार्मिक काम में जुटsता. सब सरकार आ मीडिया के ढकोसला ह. गाँव में शादी-बियाह आ लापरवाही चलत रहल. अब आलम ई बा कि गाँवहूँ में ई बेमारी फइल गइल बा, लोग के जान जा रहल बा, मौत के आंकड़ा बढ़ रहल बा, श्मशान में लाइन लाग रहल बा. खबर में त सुनले होखब कि आपने घर वाला अपना आदमी के अर्थी नइखे छूअत एह डरे कि ओकरा कोरोना मत हो जाव. प्रशासन के गुहार लगावे के पड़sता कि लाश के अंतिम संस्कार के व्यवस्था कइल जाय. लाश के जवन गजन होता, न्यूज आ सोशल मीडिया पर उ सब देख के दिल दहल जाता. ई कोरोना एह सदी के मानवता पर आइल सबसे बड़ त्रासदी बा. गाँव के एक जना बाबा बतवलें कि प्लेग के महामारी जब आइल रहे, गांव के गाँव साफ हो जाव, लोग लाशन के असहीं छोड़ के भाग जाव, घर छोड़ के बारी-बगइचा में रहे, लोग पलायन कर जाव, बड़ डरावना समय रहे. कहे के माने बा कि मानवता के ऊपर समय-समय पर अइसन प्रकोप होत रहल बा आ इंसान ओकरा से पार पावत रहल बा. अब कोरोना के वैक्सीन आ गइल बा, ओकर सकारात्मक असर भी हो रहल बा, कोरोना के इलाज खातिर नया-नया दवाई भी खोजा रहल बा, ऑक्सीजन के किल्लत से मर रहल लोग खातिर ऑक्सीजन के नया-नया प्लांट खुल रहल बा, विदेशी मदद मिल रहल बा त हमनियो के सकारात्मक रहे के चाहीं. ज्यादा छरिअइला प बेचैनिये बढ़ी. हां, ऑक्सीजन आ इलाज के कमी से लाखो लोग के जान गइल बा, ई क्षम्य नइखे. कुछ लोग वैक्सीन के खिलाफ भी भड़कावता. कुछ लोग दवाई, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस के कालाबाजारी में लागल बा. कुछ लोग दवाई आ उपकरण के मुहैया करावे के नाम पर ऑनलाइन ठगी में लागल बा त इहे नू कलयुग ह. एही में अपना बुद्धि-विवेक से निर्णय लेवे के बा. अरे भाई एही में अइसनो लोग बा जे अपना आ अपना परिवार के जान जोखिम में डाल के दिन-रात सेवा में लागल बा. उदहारण के रूप में डॉक्टरे लोग के देख लीहल जाव. उ अदिमिये कइसन जेकरा में दया, प्रेम, करुणा आ ममत्व के भाव ना होखे. मनुष्यता के त इहे सब पहचान ह. जेकरा में से इ सब गायब होला उ अपराधी बन जाला. त का ई कोरोना काल आदमी के आदमी बना दी ? लोग कहsता कि तीसरा लहर भी आवे वाला बा. जब ले कोरोना के समूल नाश ना होई तले ई रक्तबीज बन के उगत रही, एही से हमनी के भी माँ चंडी के जइसे एकर विनाश करे खातिर एक साथे मिल के, एक दूसरा के सहयोग, अपना अंदर के मनुष्यता के जीवित रख के उ सब करे के पड़ी जवन जरुरी बा. कोरोना काल खातिर लिखल अपना संकल्प गीत से बात ख़तम करत बानी – नेह-नाता के ऑक्सीजन से मन के इम्यून के बढ़ावे के जंग जीते के बा कोरोना से एही संकल्प के गोहरावे के दुख त चारो तरफ पसरले बा सुख के कुछ गीत अब कढ़ावे के यार जहिया ले सांस साथे बा जिंदगानी के गीत गावे के ( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य और सिनेमा के जानकार हैं.)



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