Bhojpuri: अक्षय तृतीया के समहुत, एकर किसान जीवन में बा बड़ा महातम

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अस्तिरिथिया के समहुत क मतलब नया साल में खेती बारी क शुरुआत. पूर्वी उत्तर प्रदेश में एह दिन के परंपरा से बड़ा महत्व बा. लेकिन आज के मशीन के समय में लोग इ कुल भुलात जात बाडन. हमके आपन बचपन याद आवेला, जब हमनी के खेती हल-बैल से होखे, पूरा गाँव के समहुत एही दिन पूरा विधि-विधान से होखे.

अक्षय मतलब, जेकर क्षय न होखे. यानि जेवन कबो न घटे. इही से अक्षय तृतीय यानि अस्तिरिथिया के किसान जीवन में बहुत महातम बा. खेती बारी भारतीय जीवन का आधार ह. कृषि जीवन के हर एक काम में लोक के अलग अलग रूप देखे के मिलेला. नया साल, यानि चइत महीना से शुरू होखे वाला साल क पहिला त्यौहार अस्तिरिथिया के समहुत होला. बैशाख के अंजोर के तीसरा दिन एके मनावे के परंपरा बाटे. अइसन मान्यता बा कि इ दिन बहुत शुभ होला. एही से ए दिने खेती के शुरुआत यानि समहुत कइल जाला. अस्तिरिथिया के समहुत क मतलब नया साल में खेती बारी क शुरुआत. पूर्वी उत्तर प्रदेश में एह दिन के परंपरा से बड़ा महत्व बा. लेकिन आज के मशीन के समय में लोग इ कुल भुलात जात बाडन. हमके आपन बचपन याद आवेला, जब हमनी के खेती हल-बैल से होखे, पूरा गाँव के समहुत एही दिन पूरा विधि-विधान से होखे. लोक में एकर मान्यता ई बा कि एह दिन से नया साल के खेती बारी के शुरुआत होला. जे अस्तिरिथिया के समहुत कर लेला ओके साल के अउर कौनो समहुत करे के जरुरत ना पडेला. इही से एकर एतना महातम बा. समहुत के शुरुआत सबसे पहले गाँव के पंडित जी से साईत पुछ के होला. घर के कुल मर्द लोगन के नाव बतावल जाला फिर पंडित जी केहु एक आदमी के नाम से साइत बतावेलन. समहुत का दिने विशेष भोजन बनेला जेमे दाल वाली पूरी, पाकल कोहड़ा के मिठकी तरकारी अऊर कच्चा आम डाल के आटा के मुरब्बा (गुरुमा) बनेला. समहुत करे के सामग्री में सबसे पहिले लकड़ी क एक बिता क हल और समहुती लउर (लाठी) जीवन क सामान्य उपयोग ना होला. इ लऊर बस समहूत का दिने ही निकालल जाला. एकरा बाद सवा किलो सावां, जनेरा (ज्वार) या बजड़ा (बाजरा) में से कौनो एगो के बीज, फूल, फुलहा लोटा में भर के साफ जल, घी क दिया, अगरबत्ती, दहीगुड़ जुटावल जाला. एक ओर समहुत के तैयारी शुरू होई और दूसरा ओर दाल पूरी बनावे खातिर चना क दाल रसोई में उबाले खातिर रखा जाई. समहुत करे खातिर बीच आँगन में लीप पोत के ठहर दियाई और पूरब मुहें समहुत करे वाला के बैठे खातिर एगो पीढ़ा धराला. ओकरा बाद लाठी और हल के साफ पानी से धो के ठहर पर रखल जाला. समहुत करे वाला नहा के साफ कपड़ा पहिन के आंगन में ठहर पर बइठेला. सबसे पहिले जल वाला लोटा में रस्सी क अरिवन लगा के लउर में टांगेला. ओकरा बाद कटोरी में दहीगुड़ मिला के लोटा का ऊपर रखल जाला. दही वाली कटोरी के पतई के दोना से या प्लेट से ढक देहल जाला. फिर सावां के बीज के गमछा का एगो छोर पर गठिया लेहल जाला. गमछा का दूसरा छोर पर पूजा वाला सामान गठियावल जाला. ओकरा बाद गमछा के लउर के दूसरा छोर पर बांध देहल जाला. समहुत करे वाला नंगे पांव खेत तक जाला. समहुत ओही खेत में कईल जाला जेवना में खेती होखे. कुछ लोग बगईचा में भी समहुत करे ला. घर से निकलला के बाद घरे अईला तक समहुत करे वाला रास्ता में कुछ भी बोलेला ना. जब खेत में पहुंचेला त साईत में जेवन दिशा पंडित जी बतवले रहेलन ओही दिशा में बैठेला. ओकरा बाद खेत बनावेला. खेत बनावे क नियम बाटे. उ एह तरे ह. दखिन एक बित्ता, उत्तर डेढ़ बित्ता, पूरूब- पछिम आधा-आधा बित्ता. एही नाप से नाप के खेत बना के काठ के लकड़ीनुमा हल से जुताई करके थोड़ा सा बीज छिटल जाला. फिर जल चढ़ा के फूल अउर दहीगुड़ चढ़ावल जाला. ओकरा बाद दिया और अगरबत्ती दिखा के खेत के प्रणाम कईल जाला. अउर इ बिनती कईल जाला कि आवे वाला खेती के सम्मान बचल रहे अउर घर परिवार क भरण पोषण ठीक से हो जाए. जेवन बीज बचल रहेला ओके गठिया के घरे ले आइल जाला. फिर उ बीज जब खेत के बोआई होला त ओमे मिलाके बोवल जाला. घरे आइला के बाद आँगन में ओही ठहर पर बईठ के कुल समान रख देहल जाला. फिर ओहि जे पानी पियले के बाद उठ के अपना घर के सभी बड़ लोगन के प्रणाम कईल जाला.कुल मिला के अस्तिरिथिया खेती वाला जीवन क उत्साह अउर आस्था के दिन ह. एह दिन का बाद किसान लोगन का मन से बहुत कुछ क भय भी समाप्त हो जाला. साथ ही अब कौनो भी सामान्य बाधा आवे के भय ना रहेला. मानल ट इहो गईल बा कि अस्तिरिथिया के समहुत के बाद खेती में नुकसान के संभावना बहुत कम हो जाला और उपज बहुत बढ़िया होला. (लेखक संतोष कुमार राय पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)







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