Bhojpuri: बनारसी लंगड़ा, पढ़ीं अउर जानीं एह आम के खास कहानी

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बनारसी लंगड़ा क नाम लेतय दिल-दिमाग गमकि उठयला, अउर मुंहे में पानी आइ जाला. बनारस के शान में एक सितारा ई आम भी हौ. अपने सवाद अउर सुगंध बदे पूरे दुनिया में मशहूर बनारसी लगड़ा काशी में बाबा भोलेनाथ क प्रसाद हौ. ई प्रसाद अब काशी कइसे पहुंचल, एकर कहानी गंगा के बनारस पहुंचय से कम रोचक नाहीं हौ. आम फलन क राजा मानल जाला, अउर लंगड़ा सबके दिल पर राज करयला. बनारस में 1700 एकड़ जमीन पर लंगड़ा क बगइचा हयन. चिरई गांव, आराजीलाइन, सेवापुरी, काशी विद्यापीठ, हरहुआ, बड़ागांव, अउर रामनगर सहित आठ ब्लॉक हयन, जहां लंगड़ा क जादा खेती होला. लंगड़ा क खासियत एकर अकार, प्रकार, सुगंध अउर सवाद हौ. पहिले इ आम अपने अकार से आकर्षित करयला, फिर नजदीक गइले पर सुगंध से मस्त कइ देला अउर खइले के बाद अपने सवाद से जीवन भर बदे दीवाना बनाइ लेला. कगजे की नाईं पतील क बोकिला अउर ओइसय कगजे की नाई पतील क कोसुली, अउर दूनों के बीच में लंगड़ा क गूदा तीनों लोक के रहस्य से कम नाहीं हौ. बखान केतनव कइ नावा लेकिन असली असर खइले के बादय होला. सीजन आइ पहुंचल हौ, अउर अगर अबही तक लगड़ा न खइले होवा त एह सीजन में जरूर भोलेनाथ क इ प्रसाद चखा. मानसून अइले के बाद जुलाई से बजारी में लंगड़ा क दबदबा शुरू होइ जाला. लंगड़ा क नाम अउर काम, दूनों हर आदमी के हैरत में डालयला. काहें से कि दूनों में छत्तीस क आंकड़ा हौ. ओइसे बनारस में कहावत चलयला कि नाम अउर चाम क नाहीं, पूजा काम क होला. अब लंगड़ा के काशी में अवतरित होवय के पीछे वाली कहानी परआवा. ई कहानी कहीं लिखा-पढ़ी में नाहीं हौ. पुरनियन के मुंहे से पीढ़ी दर पीढ़ी चलल आवत हौ. कहानी में कहल जाला कि लगभग 250 साल पहिले इहां एक ठे भगवान शिव क मंदिर रहल. कहां रहल, एकर कवनो सही जानकारी नाहीं हौ. मानल जाला कि मंदिर रामनगर इलाके में रहल. मंदिर में एक दिना एक ठे साधु पहुंचलन, अउर मंदिर में कुछ दिना रहय बदे पुजारी से आग्रह कइलन. मंदिर परिसर में कई ठे कमरा रहल अउर पुजारी एक ठे कमरा खोलि देहलन. साधु आपन डेरा जमाइ लेहलन.साधु के पास आमे क दुइ ठे छोट-छोट पौधा रहलन. दूनों पौधा उ मंदिर के पिछवारे लगाइ देहलन. साधु रोज पूजा-पाठ कइले के बाद दूनों पौधन के जल चढ़ावय. धीरे-धीरे चार साल बीति गयल अउर आम के दूनों पौधन में बउर आइ गयल. अब साधु मंदिर के पुजारी से कहलन कि हमार इहां से जाए क समय आइ गयल हौ अउर काल हम चलि जाब, लेकिन दूनों पेड़न के देखभाल क जिम्मेदारी अब तोहरे ऊपर हौ. साधु आगे कहलन कि दूनों पेड़न में जवन आम लगिहय, ओके भगवान के चढ़इले के बाद टुकड़ा-टुकड़ा कइ के लोगन के प्रसाद में बांटि देहल करिहा. लेकिन पूरा आम केहूं के भी नाहीं दीहा. साधु आमे क कोसुली भी दूसरे के देवय बदे मना कइले रहलन अउर ओके जरावय क निर्देश देहले रहलन. एकरे अलावा उ पेड़ में कलम भी लगावय बदे मना कइले रहलन. साधु जवन-जवन कहले रहलन, पुजारी उहय-उहय कइलन. लेकिन जे भी आमे क प्रसाद खाय, उ ओकरे सवाद अउर सुगंध क दीवाना होइ जाय. मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलय वाले आम क चारों ओर सुगंध फइलि गइल. हर आदमी कोसुली अउर कलम बदे पुजारी से आग्रह करय लगल, जवने से आमे क दूसर पेड़ तइयार होइ सकय. लेकिन पुजारी साधु के दिहल बचन से बंधल रहलन. उ साफ इनकार कइ देय. आम प्रसाद क बखान सुनि के एक दिना खुद काशी नरेश मंदिर पहुंचलन. आम क प्रसाद ग्रहण कइले के बाद उ भी ओकर दीवाना होइ गइलन. काशी नरेश भी आम के दूनों पेड़न में कलम लगावय बदे पुजारी से आग्रह कइलन. पुजारी धर्मसंकट में पड़ि गइलन. एक तरफ साधु क निर्देश अउर दूसरे तरफ काशी नरेश क आग्रह. पुजारी काशी नरेश से कहलन कि महराज एह काम बदे पहिले बाबा भोलेनाथ से अनुमति लेवय के पड़ी, काल बताइब. ओही रात पुजारी के सपने में भोलेनाथ दर्शन देहलन अउर कहलन कि काशी नरेश के आम क कलम लगावय क अनुमति देइ द. कवनो रुकावट मत डाला. दूसरे दिन सबेरे पुजारी मंदिर में पूजा-पाठ कइले के बाद टोकरी में आम लेइके काशी नरेश के पास गइलन अउर ओन्हय आम क प्रसाद समर्पित कइलन अउर पेड़ में कलम लगावय क अनुमति देइ देहलन. काशी नरेश क प्रधान माली मंदिर जाइ के दूनों पेड़न में कई ठे कलम लगाइ देहलस. बरसात के मौसम में जब पानी बसरल त कलम मे जड़ निकलि आइल अउर ओके काटि के काशी नरेश के पास लेइ जायल गयल. आम क इ कलम महल के परिसर में लगाइ देहल गइलन अउर कुछ साल में इ बढ़ि के पेड़ होइ गइलन. मौसम आयल त पेड़ में बउर अउर फिर फल लटकि गइलन. धीरे-धीरे कलम से तमाम पेड़ तइयार भइलन अउर पूरा बगइचा बनि गयल. रामनगर में आज भी लंगड़ा आम क बड़ा-बड़ा बगइचा हयन. जवने जगह आज काशी हिंदू विश्वविद्यालय हौ, उ पहिले काशी नरेश क ही जमीन रहल अउर उहां भी लंगड़ा आम क बगइचा रहलन. बीएचयू में आज भी लंगड़ा आम क तमाम पेड़ हयन.
इ त रहल लंगड़ा के काशी में अवतरित होवय क कहानी, लेकिन एतने बढ़िया आम क लंगड़ा नाम कइिसे पड़ल? दरअसल, साधु के हाथे क लगावल दूनों पेड़न क देखभाल जवन पुजारी कइले रहलन, अउर जेकरे कारण लंगड़ा क परिवार बढ़ल, उ तनी लंगड़ाइ के चलय. बस, ओनके एही सोभाव के नाते आम क नाम लंगड़ा पड़ि गयल. पहिले बनारस में लगड़ा आम क बगइचा छह हजार हेक्टेयर में रहलन, लेकिन अब धीरे-धीरे घटि के 1700 एकड़ में रहि गयल हयन. एकरे अलावा लंगड़ा पेड़ उत्तर प्रदेश के दूसरे जनपदन में अउर बिहार में भी पहुंचि गयल हयन, लेकिन जवन सवाद बनारस वाले लंगड़ा में रहयला, उ दूसरे जगह वाले लंगड़ा में ना पइबा. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



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