विद्या वाणी

    विद्या वाणी

आचार्य श्री विद्यासागरजी ने कहा कि- प्रकृति विरुध्द किसी भी प्रकार का कार्य करना हमेशा विनाश का कारण बनता है , समय समय पर फैलने वाली महामारी जैसे स्वाईन फ्लू , बर्ड फ्लू और अब कोरोना क्यों आई ? यदि हम गहराई से चिंतन करे तो पायेंगे कि मांस भक्षण करना प्रकृति के नियमों के विपरीत अमानवीय कार्य है । प्रत्येक जीव को जीवन जीने का अधिकार है और प्रत्येक जीव का अस्तित्व इस पृथ्वी पर स्वतंत्र है , ऐसे निर्दोष जीवों का अकारण वध करना क्या अपराध नहीं है ?

प्रकृति विरूध्द कार्य करना प्रज्ञा अपराध है ।
  वर्तमान साक्षी है ,प्रज्ञा अपराध का। चीन जैसे विकसित देश में अत्यंत जहरीले पशु - पक्षियों के मांस भक्षण का ही परिणाम है यह कोरोना । क्या कभी चिंतन किया है कि हमारा शरीर और पशु - पक्षियों का शरीर अनेक रोग से ग्रस्त है । अनजाने में मांस भक्षण करने वाले रोग से ग्रसित और जानवर के मांस का भक्षण करने के कारण अकाल मौते या अनेकों बिमारीयों के शिकार बन जाते है । क्या कैंसर , टी.बी. या अन्य बिमारी उन पशु - पक्षियों को नहीं हो सकती जो मनुष्यों को होती है ।

    जब एक बीमार व्यक्ति से दूसरे को दूर रखा जाता है , इतनी सावधानी रखते हैं और यदि जिस मास का भक्षण कर रहे हैं वह रोग से ग्रसित न हो इसकी क्या गारंटी है ? हर वह कार्य जो नहीं करना चाहिए यदि किया जा रहा है तो वह प्रज्ञा अपराध है । विज्ञान भी इस सिध्दांत को धर्म के आधार परमानने को विवश है । आज के वैज्ञानिक रात्रि भोजन त्याग एवं अनाज का कई बीमारियों में सेवन न करना , छना हुआ पानी पीना , भोजन को पूर्ण पका कर खाना और शाकाहारी भोजन करने की सलाह देते है । अर्थात् यह सब सही है , क्यों हम नवरात्रि , गणेश और अन्य पर्वो पर मांस भक्षण का त्याग करते हैं अर्थात् मांस भक्षण धर्म उपयुक्त नहीं हैं । आचार्य श्री ने कहा कि पूरे विश्व में प्रज्ञा अपराध हो रहे हैं,इसी कारण यह आपदायें आ रही है । कुछ समय पूर्व स्वाईन फ्लू , बर्ड फ्लू , मेड काऊ जैसी महामारी का कारण भी मांस भक्षण करने पर हुआ , अब कोरोना ने भी सिध्द कर दिया कि मांसाहार से ही इस बीमारी ने अपना जाल फैलाया है । भारतीय संस्कृति कृषि प्रधान संस्कृति रही हैं , किंतु आज मांस निर्यात को व्यापार एवं उद्योग का दर्जा देना ऐसी महामारियों को आमंत्रण देने में सहायक बनता है , यह प्रज्ञा अपराध है । जो भी हारा है वह प्रज्ञा अपराध प्रकृति विरूध्द से ही हारा । वह प्रज्ञा अपराध है जो प्रकृति विरूध्द है । 

आचार्य श्री विद्यासागरजी ने कहा कि मैं आधार सहित बोल रहा हूँ कि आचार्यों ने कहा है कि ऐसी गंभीर परिस्थिती में चूप नहीं रहना चहिए । इसलिए बोल रहा हूँ , प्रज्ञा अपराध की अनेकों आचार्यो ने ग्रंथो में प्राचीन काल से उल्लेख किया है । भगवत गीता , चरक संहिता के ८ सूत्रीय एवं समयसार महाग्रंथ की गाथा में भी प्रज्ञा अपराध को लेकर अनेको टीका है । प्रवचनसार , कल्याणकारक ग्रंथ के साथ - साथ दिल्ली एम्स के निर्देशक ने भी माना है कि इस प्रज्ञा अपराध से बचकर विश्व के जीव मात्र के प्रति करूणाभाव रखना चाहिए और महाअपराध से बचना चाहिए । जंक फूड , जंग लगा हुआ खाना , सी फूड देख सकते है लेकिन ये खाने योग्य बिल्कुल नहीं होते । दूषित खानपान की प्रकृति प्रज्ञा अपराध है , इससे बीमार हो जाओ तो कोई उपचार नही है , ऐसा नहीं है । मांस भक्षण न करना ही इसका सर्वश्रेष्ठ उपचार है । आयुर्वेद प्राचीनकाल से सर्वश्रेष्ठ उपचार का साधन है । 

    आचार्य जी ने बताया कि मार्तंडपुराण में भी मांस भक्षण को निषेध किया गया है । महाभारत में भी अर्जुन ने युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए रात्रि भोजन एवं मांस भक्षण को निषेध बताया है । विश्व के महानतम व्यक्ति भी हमेशा शाकाहार का सेवन करते रहे और दीर्घायु हुए , जैसे एल्बर्ट आईन्सटाईन ने कहा था कि शाकाहार मनुष्य के दिमाग का संतुलन बनाये रखता है एवं महामारियों से बचाता है । शाकाहार प्रवर्तक महात्मा गांधी के आदर्श गुरू लिया टालस्टॉय ने कहा था कि- मांस भक्षण अनैतिक है और मानवीय मूल्यों के विपरीत है । मनोवैज्ञानिक फ्रेजर ने कहा था कि- मन प्रसन्न होकर जीवन जीने से सभी तरह के संक्रमण दूर हो जाते है , यदि हम सभी इतिहास के इन महापुरूषों का यदि अनुसरण करें तो पायेंगे कि अप्राकृतिक कृत्य मांस भक्षण ही सभी महामारियों की असली जड है ।

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